history of harsh sikar rajasthan

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हर्ष मंदिर राजस्थान में कला की दृष्टि से बहुत उन्नत श्रेणी का है. यह मंदिर अरावली की पहाड़ियों पर 3000 फीट की ऊंचाई पर गर्वपूरक खड़ा है. मंदिर आज भग्न अवस्था में श्रीहीन हो चुका है पर जो कुछ बचा है वह इसकी महानता और उत्कृष्टता स्थापित करने में समर्थ है. यहाँ वि.स. 1030 (973 ई.) का 48 पंक्ति का चौहानों का शिलालेख चौहान वंशावली, इस देवालय के निर्माण, अलंकरण, साधनों आदि की विस्तृत जानकारी देता है. यह मंदिर भग्नावस्था में है. यह स्थापत्य एवं मूर्ती कला के उत्तरी-भारत में सबल प्रतिनिधि होने के साथ-साथ चौहानों की यशोगाथा को मुखरित करता है. हर्ष मंदिर की मूर्तियाँ विश्व के अनेकों कला संग्रहों में मिलती हैं और सराही जाती हैं. मंदिर कुछ शतियों पूर्व भग्न हो गया था. आज पार्श्व की दीवारें टूटी हुई हैं जिन्हें पत्थरों से फिर जड़ दिया गया है. सभा मंडप एवं गर्भ गृह के कुछ भाग शेष हैं.

 

कैप्टेन वेब लिखते हैं कि जब वे हर्ष के ब्राह्मण पुजारियों से मिले तो बताया गया कि यह गाँव विध्वंश कर दिया गया था और इसके निवासियों को मौत के घाट उतार दिया गया जब मुसलमानों द्वारा सन 1679 में मंदिर ध्वस्त किया गया था. जो मौत से बच गए उन्होंने हर्ष का वर्तमान गाँव बसाया. इस मंदिर का सर्वनास सन 1679 में तब हुआ जब खानजहां बहादुर ने मुग़ल बादशाह औरंगजेब के आदेशानुसार या किसी तरह उस मूर्ती-भंजक स्वेच्छाचारी शासक को प्रसन्न करने के लिए मंदिर पर हमला कर हर्ष के मंदिरों को जमींदोज कर दिया और प्रत्येक मूर्ती और गढ़ाई के कार्य को विकृत कर दिया. कोई भी बड़ा टुकड़ा अछूता नहीं बचा.

कैप्टेन वेब सीकर के प्रशासक 1934 से 1938 की अवधी में रहे हैं. हाल ही में उनके द्वारा अंग्रेजी में लिखे अभिलेखों का अनुवाद कर भगवान सिंह झाझड़िया ने ‘सीकर की कहानी कैप्टेन वेब की ज़ुबानी’ नामक पुस्तक 2009 में प्रकाशित किया है. इससे पता लगता है कि कैप्टेन वेब ने इस धरोहर को बचाने और सुरक्षित करने का काफी प्रयास किया. वेब ने भग्नावस्था में बिखरी पडी पुरासंपदा को सीकर में लाकर संग्रहालय में रखवाया.

कैप्टेन वेब हर्ष मंदिर के निरीक्षण के समय ध्वंश को देखकर इतने व्यथित हुए कि वे लिखते हैं कि तब मेरा क्रोध बचकानी ध्वंशात्मक प्रवृति के प्रतीक उनके मुस्लिम नौकर के प्रति जाग्रत हुआ और मैंने उसे जितना बड़ा टुकड़ा मैं उठा सकता था उसके हाथों में लाद दिया और उसके पूर्वजों के प्रति अपराध के लिए उसे आदेश दिया क़ि वह इसे पहाड़ी के नीचे ले जाए. बिना हिचक उसने हुक्म का पालन किया, केवल यह कहते हुए कि वह भी मूर्तिपूजा का समर्थन नहीं करता.

हर्ष का मंदिर पहाड़ पर बना है. हर्ष पहाड़ ऊपर जाकर समतल सा हो गया है. पहाड़ पर काफी समतल भाग छोड़कर पूर्वाभिमुखी मंदिर बनाया गया था. शिलालेख से ज्ञात होता है की चौहान नरेश सिंहराजा ने इस पर स्वर्णकलश चढ़ाए थे (श्लोक:१८ – हेममारोपित येन शिवस्य भवनोपरि). देवालय को अनेक गाँव सेवा पूजा के लिए भेंट स्वरुप दिए गए थे (श्लोक: २५ – छत्रधारा वर ग्रामो द्वितीय: शंकराणक:). शिलालेख में इस मंदिर को चंद्रांक शैल पर स्थित, उतुंग श्रृंग एवं पशुपति के सद्विमान बताया गया है. शिला लेख के अंत में हर्षदेव के भवन के चिर स्थायित्व के लिए शुभ कामना प्रकट की है. हर्म्य निर्माण काल 1013 वि.स. (956 ई.) दिया है.

हर्ष मंदिर की अनेकों मूर्तियाँ राजपूताना संग्रहालय नई दिल्ली में हैं. संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के क्लीव लैंड म्यूजियम आफ आर्ट में हर्ष मंदिर की मूर्तियाँ हैं. अमेरिका के नेल्सन एटकिन्स गैलरी, फिलाडेल्फिया म्यूजियम आफ आर्ट में भी कई मूर्तियाँ विद्यमान हैं. पेरिस के रोवर्ट रूसों के निजी संग्रह में भी हर्ष की मूर्तियाँ हैं. अजमेर म्यूजियम में अनेक फलक हैं.

हर्ष की मूर्तियों को देखने से ज्ञात होता है की इनमे लौकिक और धार्मिक दोनों विषयों से सम्बंधित मूर्तियाँ परिलक्षित होती हैं. लोकिक विषयों में नर्तक-नाटकी, गायक-गायोकाएं, योद्धा, हाथी, सामान्य सैनिक, अप्सराएँ, शाल-भंजिकाएं, दासियाँ आदि की कला पूर्ण मूस्तियाँ हैं. दैविक विषयों में अनेक रूपों में विष्णु, इन्द्र, शिव, शक्ति, गणेश, कुबेर आदि मनोरम प्रतिमान हैं. मूर्तियों की संख्याधिख्य को देखकर विस्मय होता है

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